Mayank Baranwal

Mayank Baranwal

PhD, UIUC

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About KahaniWallah

KahaniWallah is an attempt to unleash the hidden story teller inside me. Unfortunately, I do not qualify as a bibliophage, however, I do listen to a lot of short stories - particuarly the ones in my mother tongue, Hindi. I always feel that certain emotions can be better expressed only in one's mother tongue, and often try to organize these thoughts and emotions in form of short stories.

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Latest Stories


राब्ता

राब्ता

बात कुछ उन दिनों की है जब नकुल शर्मा की धुआंधार बल्लेबाज़ी के चर्चे मथुरा शहर के पूरे गाँधी मिल कॉलोनी में मशहूर थे | नकुल यानि कि मैं - शर्मा परिवार का वो "ट्रेडमार्क" बेटा जिसके हुनर की मिसालें आप सबने अपने बचपन में कभी ना कभी अवश्य सुनी होंगी | हुनर के तो इतने धनी थे कि नकुल भैया को अपनी टीम में लेने के लिये आए दिन दोनों पक्षों के कप्तानों के बीच झड़प हो जाया करती थी | हालांकि यह बात अलग है कि उम्र और तज़ुर्बे, दोनों में ही नकुल भैया अन्य बच्चों की अपेक्षा कुछ बड़े थे, परन्तु इसे अनदेखा कर अपनी साख़ बनाये रखने उन्हें बख़ूबी आता था | जहाँ एक ओर बच्चा-मंडली मुझे अपना गुरु बनाने में आमादा थी, वहीं दूसरी ओर कॉलोनी के बड़ों में भी मैं कोई कम मशहूर नहीं था | दरअसल वजह यह थी कि मैं हाई-स्कूल की बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण हुआ था और गाँधी मिल कॉलोनी के बड़ों की सराहना पाने के लिये यह कारण पर्याप्त था |

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एक थाली चावल

एक थाली चावल

दसवीं की परीक्षा समाप्त हो चुकी थी और मन में एक नया उन्माद था, और हो भी क्यों ना!! छुट्टियों में दक्षिण भारत की सैर करने का कार्यक्रम था | जहाँ एक ओ़र नयी जगहें देखने का उत्साह था, वहीँ दूसरी ओ़र मन ये सोच कर भी बहुत प्रसन्न था कि अब प्रतिदिन इडली-डोसा का भोग लगाने का संयोग प्राप्त होगा | वो बात अलग है कि ३-४ दिनों के पश्चात् ही तृप्तता का अनुभव होने लगा था | चेन्नई, बेंगलुरु, मैसूर, ऊटी, कुन्नूर और कोडईकनाल जैसे कई स्थलों की सैर करने का अवसर प्राप्त हुआ | जहाँ एक ओ़र मानव-प्रदत्त गगनचुम्बी इमारतों का अवलोकन करा, वहीँ दूसरी ओ़र प्रकृति-प्रदत्त सुंदरता और शांति का अनुभव भी किया | ऐसा प्रतीत होता था मानो प्रकृति अपनी गोद में ना जाने कितने राज छुपाये बैठी है और साथ ही यह भी ज्ञात हो चुका था कि क्यों राहुल सांकृत्यायन जैसे महिषी 'घुम्मकड़ी' को अपना धर्म मानते थे |

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दस रुपए

दस रुपए

वैसे तो कानपुर से लखनऊ की दूरी मात्र ८० किलोमीटर ही है, लेकिन ये २ घंटे की रेल यात्रा सदा रोमांचकारी रही है | दीक्षांत समारोह समाप्त हो चुका था और मैं फिर भी कॉलेज छोड़के नहीं जाना चाहता था | चार साल जिस पल का इंतज़ार सबको रहता है, चार साल बाद वही पल भारी प्रतीत होता है | २९ मई, २०११ - सभी दोस्त एक-दूसरे को विदाई दे रहे थे और भविष्य में मिलते रहने की नसीहत | भारी मन से मैंने भी दोस्तों को अलविदा कहा और फिर ऑटो में बैठ गया और रेलवे स्टेशन को चल दिया |

वैसे कानपुर-लखनऊ जैसे शहरों में रेलवे टिकेट खरीदना भी एक संघर्ष है (खास-तौर पर तब, जब आपके पास बड़ा संदूक होऔर ट्रेन के आने का समय निकट आ रहा हो) | जैसे-तैसे करके मैं स्टेशन पर पहुंचा और रुमाल के प्रयोग से बोगी में अपने लिए Window Seat 'आरक्षित' करीऔर सामान व्यवस्थित करके दरवाजे के पास आ गया और अकारण ही ट्रेन के सिग्नल का इंतज़ार करने लगा | तभी एक यात्री जो पेशे से कोई व्यापारी प्रतीत होता था, अपने साथ एक विशालकाय बोरा (जिसमें सम्भवतया उसके वव्यापार का सामान रखा था) लेकर हमारी बोगी में प्रविष्ट हुआ और सामान के लिए जगह बनाने लगा | मैं भी अपनी 'आरक्षित' सीट का अस्तित्व खतरे में पाकर वापस अपने स्थान पर आ गया और अपना हाथ रख कर ये दर्शा दिया कि ये सीट मैंने एक संघर्ष में जीती है और इसे अपना समझने की भूल कदापि ना करें |

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